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सच्ची अमरता: राजा विक्रम और नेक कर्मों की कहानी

क्या पत्थर की मूरतें हमें अमर बना सकती हैं? पढ़िए 'अमृतपुर' के राजा विक्रम और नन्हे अनंत की यह प्रेरक कहानी, जो सिखाती है कि सच्ची अमरता हमारे नेक कामों में छिपी है।

By Lotpot
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यादों का महल

हम सब चाहते हैं कि दुनिया हमें हमेशा याद रखे। कोई नाम के लिए बड़ी इमारतें बनवाता है, तो कोई चाहता है कि उसकी मूर्तियाँ चौराहों पर लगें। लेकिन क्या समय की धूल इन पत्थरों को नहीं ढक देती? 'सच्ची अमरता' का अर्थ है कुछ ऐसा करना जो हमारे जाने के बाद भी लोगों के चेहरों पर मुस्कान लाए। यह कहानी 'अमृतपुर' के एक ऐसे राजा की है, जिसने अमर होने का रास्ता पत्थरों में ढूंढा, पर उसे वह मिला एक नन्हे बच्चे की निस्वार्थ सेवा में। आइए जानते हैं कि असली अमरता क्या है।

अमृतपुर का प्रतापी राजा और उसकी अनजानी चिंता

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बहुत समय पहले, एक समृद्ध और हरा-भरा राज्य था जिसका नाम था 'अमृतपुर'। यहाँ के राजा विक्रम अपने न्याय और वैभव के लिए प्रसिद्ध थे। उनके राज्य में कभी किसी चीज़ की कमी नहीं थी। राजा विक्रम अब वृद्ध हो रहे थे, और उनके मन में एक बात घर कर गई थी—"मेरे बाद मुझे कौन याद रखेगा?"

उन्हें लगा कि यदि उन्होंने कुछ विशाल और भव्य नहीं बनवाया, तो आने वाली पीढ़ियाँ उन्हें भूल जाएंगी। उन्होंने अपने राज्य के सबसे बड़े वास्तुकारों और शिल्पकारों को बुलाया और आदेश दिया, "मेरे लिए एक ऐसा स्मारक बनाओ जो हज़ारों सालों तक टिका रहे। मैं चाहता हूँ कि मेरी एक ऐसी विशाल मूर्ति बने जिसे देख कर लोग सदियों तक मेरा नाम लेते रहें।"

शिल्पकारों ने दिन-रात मेहनत की। पहाड़ के सबसे ऊँचे शिखर पर राजा विक्रम की एक विशाल पत्थर की मूर्ति तराशी गई। वह मूर्ति इतनी ऊँची थी कि बादलों को छूती प्रतीत होती थी। राजा विक्रम उसे देख कर बहुत खुश हुए। उन्हें लगा कि अब वे 'अमर' हो गए हैं।

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समय का प्रहार और पत्थर की हार

वर्ष बीतते गए। राजा विक्रम का शासन समाप्त हुआ और उनके पुत्र, फिर उनके पौत्र राजा बने। समय का चक्र अपनी गति से चलता रहा। हज़ारों साल बीत गए। वह विशाल पत्थर की मूर्ति, जिस पर विक्रम को इतना गर्व था, अब खंडहर में बदल रही थी। बारिश, धूप और आंधियों ने पत्थर को कमजोर कर दिया था। मूर्ति का एक हाथ टूट गया था और चेहरा पहचान में नहीं आता था।

अब अमृतपुर के लोग उस मूर्ति को देखकर यह भी नहीं जानते थे कि वह किसकी है। बच्चे उसके पास खेलते और पूछते, "दादाजी, यह पत्थर का ढांचा किसका है?" और बड़े कहते, "शायद कोई पुराना राजा रहा होगा, अब किसे याद!"

पत्थर की वह मूर्ति समय की धूल में दब गई थी। राजा विक्रम का वह सपना कि पत्थर उन्हें अमर बना देंगे, टूट चुका था।

नन्हे अनंत और छायादार पीपल का पेड़

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उसी राज्य के एक छोटे से गाँव में अनंत नाम का एक लड़का रहता था। अनंत के पास न तो धन था और न ही कोई पद, लेकिन उसके पास एक बड़ा दिल था। जब वह छोटा था, उसने देखा कि गाँव के बीचों-बीच एक सूखा मैदान है जहाँ दोपहर में यात्री धूप से बेहाल हो जाते हैं।

अनंत ने वहाँ एक नन्हा सा पीपल का पौधा लगाया। वह रोज़ मीलों दूर से पानी लाकर उस पौधे को सींचता। गाँव वाले उसका मज़ाक उड़ाते, "अरे अनंत! इस सूखे मैदान में यह पौधा क्या कभी बड़ा होगा? क्यों बेकार मेहनत करते हो?"

लेकिन अनंत बस मुस्कुरा देता। धीरे-धीरे वह पौधा एक विशाल पेड़ बन गया। उसकी घनी छाँव ने पूरे मैदान को ढक लिया। अनंत अब बूढ़ा हो गया था, लेकिन उस पेड़ की सेवा करना उसने नहीं छोड़ा। उसने पेड़ के नीचे एक पानी का मटका भी रख दिया ताकि राहगीर अपनी प्यास बुझा सकें।

जब राजा को मिला जीवन का सबसे बड़ा सबक

कहानी के इस मोड़ पर एक चमत्कार हुआ। ऐसा कहा जाता है कि राजा विक्रम की आत्मा, जो अपनी मिट्टी की मूर्ति को गिरते देख दुखी थी, एक यात्री का वेश धरकर उसी गाँव में आई। उन्होंने देखा कि उनकी विशाल मूर्ति को तो कोई नहीं पहचानता, लेकिन इस बूढ़े अनंत के पास हर कोई रुकता है।

राजा ने एक थके हुए किसान से पूछा, "भाई, तुम इस पेड़ के नीचे क्यों रुकते हो? क्या यह किसी राजा ने लगवाया है?"

किसान ने पानी पीते हुए सुकून से कहा, "नहीं साहब, इसे तो हमारे दादा अनंत ने अपनी मेहनत से लगाया था। वे अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी दी हुई यह ठंडी छाँव और यह मीठा पानी आज भी हमें उनकी याद दिलाता है। जब तक यह पेड़ रहेगा, हम अनंत को दुआएं देते रहेंगे।"

राजा विक्रम की आँखें खुल गईं। उन्हें समझ आ गया कि जिस 'सच्ची अमरता' को वे पत्थरों में खोज रहे थे, वह तो इस पीपल की छाँव में छिपी थी। पत्थर समय के साथ टूट जाते हैं, लेकिन दूसरों की भलाई के लिए किए गए कार्य युगों-युगों तक जीवित रहते हैं।

सच्ची अमरता: कर्मों की महक

राजा विक्रम ने महसूस किया कि अमर होने के लिए मूर्तियाँ बनवाना ज़रूरी नहीं है। अगर हम किसी प्यासे को पानी पिलाते हैं, किसी भूखे को खाना खिलाते हैं, या किसी के जीवन में शिक्षा का प्रकाश फैलाते हैं, तो हम वास्तव में अमर हो जाते हैं।

अनंत की कहानी पूरे राज्य में फ़ैल गई। लोग अब पत्थर के स्मारक बनवाने के बजाय कुएँ खुदवाने, पेड़ लगाने और स्कूल बनवाने लगे। अमृतपुर अब केवल धन से ही नहीं, बल्कि नेक कर्मों से भी अमीर हो गया था।

कहानी की सीख (Moral of the Story)

यह कहानी हमें सिखाती है कि "सच्ची अमरता हमारे नाम में नहीं, बल्कि हमारे नेक कामों (Deeds) में होती है।" पत्थर और इमारतें समय के साथ ढह सकती हैं, लेकिन जो सेवा भाव और प्रेम हम दूसरों को देते हैं, वह लोगों के दिलों में हमेशा जीवित रहता है। अमर वह नहीं जो हज़ारों साल जीता है, बल्कि अमर वह है जिसने दूसरों के लिए कुछ सार्थक किया हो।

इतिहास में अमर हस्तियों और उनके महान कार्यों के बारे में और अधिक जानने के लिए आप महान व्यक्ति - विकिपीडिया देख सकते हैं।

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